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व्याधिहर वैष्णव कवच स्तोत्र | श्री नारायण कवच, प्रयोग विधि सहित

यदि आप यह ढूंढ रहे हैं कि रोगों को बिना दवाओं के कैसे दूर करें, तो इसका भी उपाय है; परंतु इस उपाय को जानने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि रोगी कौन है,

व्याधिहर वैष्णव कवच:

यदि आप यह ढूंढ रहे हैं कि रोगों को बिना दवाओं के कैसे दूर करें, तो इसका भी उपाय है; परंतु इस उपाय को जानने से पहले हमें यह जानना चाहिए कि रोगी कौन है, और रोगियों का शाकाहार से क्या संबंध है। तो दhखिए जो शाकाहारी है वे लोग भी रोगी होते हैं और जो शाकाहारी नहीं हैं, वे लोग भी रोगी हो जाते हैं। परंतु कुछ लोग शाकाहारी है और वे सुखी है ,और कुछ लोग मांसाहारी है वे भी दुसरों की नजर में सुखी हैं। अतः सुखी और रोगी होने के कई कारण होते हैं, परंतु मैं यहां पर जिस व्याधिहर स्तोत्र का वर्णन करूंगा, उसका लाभ केवल शाकाहारी और धार्मिक व्यक्ति ही उठा सकेंगे। इस व्याधिहर वैष्णव कवच स्तोत्र का विस्तृत वर्णन श्री गरुड़ पुराण में उपलब्ध है। 
व्याधिहर वैष्णव कवच स्तोत्र

व्याधिहर वैष्णव कवच स्तोत्र पाठ की विधि: 

इस व्याधिहर वैष्णव कवच स्तोत्र का नित्य स्नान के बाद आचमन, ध्यान करने के बाद नित्य पूजा-पाठ के समय इसका केवल एक बार पाठ करने से गंभीर रोग भी दूर हो जाते हैं। यदि किसी शुभ मुहूर्त (जन्माष्टमी, दीपावली, नवरात्रि, ग्रहणकाल) में पवित्रता पूर्वक इस व्याधिहर वैष्णव कवच स्तोत्र का यथाशक्ति अनगिनत पाठ कर लिया जाए तो यह सिद्ध हो जाता है। नित्य पाठ के लिए पहले स्नान करें, उसके बाद आचमन आदि करके संकल्प (पूजा-पाठ वाला) करना चाहिए और फिर यथाशक्ति पंचोपचार आदि पूजन करके भगवान की स्तुति के बाद इस व्याधिहर वैष्णव कवच स्तोत्र द्वारा भगवान की स्तुति करनी चाहिये। किसी विपत्ति/संकट के समय किसी भी अवस्था में मन में इस स्तुति का स्मरण करना चाहिये। 

भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी जी का ध्यान:

नारायणम् नमस्कृत्यम् नरं चैव नरोत्तमम्। 
देवी सरस्वतीं व्यासं ततो जय मुदीरयेत्।। 

नमस्ते पुण्डरीकाक्ष: नमस्ते विश्वभावन:।
सुब्रह्मण्यम नमस्तेऽस्तु महापुरुष पूर्वज:।।

वासुदेव सुतं देव कंसचाणूरमर्दनम्। 
देवकीपरमानन्दम् कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।। 

गोविन्दम् गोकुलानन्दम् वेणुवादनतत्परम्। 
राधिकारञ्जनम् श्यामम् वन्दे गोपालनन्दनम्।। 

व्याधिहर वैष्णव कवच स्तोत्र:

विष्णुर्मामग्रत: पातु कृष्णो रक्षतु पृष्ठत:।
हरिर्मे रक्षतु शिरो हृदयं च जनार्दन:।।

मनो मम हृषीकेशो जिह्वां रक्षतु केशव:।
पातु नेत्रे वासुदेव:श्रोत्रे सड़्कर्षणो विभु:।।

 प्रद्युम्न: पातु मे घ्राणमनिरूद्धस्तु चर्म च।
वनमाला गलस्यान्तं श्रीवत्सो रक्षतादध:।।

पार्श्व रक्षतु मे चक्रं वामं दैत्यनिवारणम्।
दक्षिणं तु गदा देवी सर्वासुरनिवारिणी।।

 उदरं मुसलं पातु पृष्ठं मे पातु लाड़्गलम्।
ऊर्ध्वं रक्षतु मे शार्ड़्ग जड़्घे रक्षतु नन्दक:।।

पाष्र्णी रक्षतु शंखश्च पद्यं मे चरणावुभौ।
सर्वकार्यार्थसिद्धर्थं पातु माम् गरूण: सदा।।

वराहो रक्षतु जले विषमेषु च वामन:।
अटव्यां नरसिंहश्च सर्वतः पातु केशव:।।

हिरण्यगर्भो भगवान् हिरण्यं मे प्रयच्क्षतु।
सांख्याचार्यस्तु कपिलो धातुसाम्यं करोतु मे।।

श्वेतद्वीत निवासी। च श्वेतद्वीपं नयत्वज:।
सर्वान सूदयतां शत्रून मधुकैटभमर्दन:।।

सदाकर्षतु विष्णुश्च किल्बिषं मम् विग्रहात्।
हंसो मत्स्यस्तथा कूर्म: पातु माम् सर्वतो दिशम्।।

त्रिविक्रमस्तु मे देव: सर्वपापानि कृतन्तु।
तथा नारायणो देवो बुद्धिं पालयतां मम्।।

शेषो मे निर्मलं ज्ञानं करोत्वज्ञाननाशनम्।
वडवामुखो नाशयतां कल्मषं यत्कृतं मया।।

पद्भ्यां ददातु परमम् सुख मूर्ध्नि मम प्रभु:।
दतात्रेय: प्रकुरूतां सपुत्रपशुबान्धवम्।।

सर्वानरिन् नाशयतु राम: परशुना मम।
रक्षोघ्नस्तु दाशरथि: पातु नित्यं महाभुज:।।

शत्रून हलेन मे हन्याद्रामो यादव नन्दन:।
प्रलम्बकेशीचाणूरपूतनाकंसनाशन:।।
कृष्णस्य यो बालभाव: स मे कामान् प्रयच्क्षतु।।

अन्धकारतमोघोरं पुरूषं कृष्णपिंगलम्।
पश्यामि भयसंत्रस्त: पाशहस्तकमिवान्तकम्।।

ततोअ्हं पुणडरीकाक्षमच्युतं शरणं गत:।
धन्योअ्हं निर्भयो नित्य यस्य मे भगवान हरि:।।

 ध्यात्वा नारायणं देवं सर्वोपद्रवनाशनम्।
वैष्णवं कवच वद्धवा विचरामि महीतले।।

अप्रधृष्योस्मि भूतानां सर्वदेवमयो ह्यहम्।
स्मरणाद्देवदेवस्य विष्णोरमिततेजस:।।

!! श्री नारायणाय नमः !!

अन्तिम बात: 

इस स्तोत्र का पाठ रोगी स्वयं कर सकता है। इसे किसी भी समय शुद्ध अवस्था में पढ़ा जा सकता है। यदि रोगी इसका पाठ करने में असमर्थ हो तो उसके घर का कोई भी परिजन रोगी के लिए पाठ कर सकता है। यदि परिवार का कोई भी सदस्य इस स्तोत्र का नित्य पाठ करेगा तो भी पूरा परिवार सुखी रहेगा, बशर्ते कि परिवार के सदस्य सन्मार्ग पर चल रहे हों। इस स्तोत्र के पाठ से कोई भी विपरीत हानि नहीं होती है। अत: बिल्कुल भी डरना नहीं चाहिए ।

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